Synopsis: A thoughtful folk ballad in Hindi about the uncomfortable space between the people we aspire to be and the people we really are. Lyrics हर चौखट पर... शीश झुका दूँ। चाहूँ तो... एक और देव बना लूँ। फिर भी मन... क्यों चुप न बैठे, जब कोई कहे... "बस एक... मैं ही सही हूँ..." [Chorus – slightly more melodic, soft harmony] मन की गाँठें... मन की गाँठें... कौन खोले? एक साथ... एक साथ... सब क्यों मैं चाहूँ? [Verse 2] चाहूँ... कोई भूखा न सोए। हर आँगन में... चूल्हा जले। फिर भी... दिल के किसी कोने में, मेरा सिक्का... ही चले। चाहूँ... सब जी-जान से खेलें। कोई भी... आधा मन न दे। फिर भी... जीत का आख़िरी सेहरा, आकर... मेरे सिर ही बँधे। [Chorus] मन की गाँठें... मन की गाँठें... कौन खोले? एक साथ... एक साथ... सब क्यों मैं चाहूँ? [Verse 3 – quieter] जानूँ जिसने... जन्म लिया है, उसको... एक दिन जाना है। फिर... भी मन ये सपना देखे, वक़्त... मुझे न छू पाए। बच्चों से कहता हूँ... "डरना मत..." ख़ुद... सारी रात जागता हूँ। माफ़ी की बातें... करता हूँ, पुरान...
SONGS for CURIOUS MINDS