हर चौखट पर... शीश झुका दूँ। चाहूँ तो... एक और देव बना लूँ। फिर भी मन... क्यों चुप न बैठे, जब कोई कहे... "बस एक... मैं ही सही हूँ..." [Chorus – slightly more melodic, soft harmony] मन की गाँठें... मन की गाँठें... कौन खोले? एक साथ... एक साथ... सब क्यों मैं चाहूँ? [Verse 2] चाहूँ... कोई भूखा न सोए। हर आँगन में... चूल्हा जले। फिर भी... दिल के किसी कोने में, मेरा सिक्का... ही चले। चाहूँ... सब जी-जान से खेलें। कोई भी... आधा मन न दे। फिर भी... जीत का आख़िरी सेहरा, आकर... मेरे सिर ही बँधे। [Chorus] मन की गाँठें... मन की गाँठें... कौन खोले? एक साथ... एक साथ... सब क्यों मैं चाहूँ? [Verse 3 – quieter] जानूँ जिसने... जन्म लिया है, उसको... एक दिन जाना है। फिर... भी मन ये सपना देखे, वक़्त... मुझे न छू पाए। बच्चों से कहता हूँ... "डरना मत..." ख़ुद... सारी रात जागता हूँ। माफ़ी की बातें... करता हूँ, पुराने शिकवे... पालता हूँ। [Chorus – fuller harmony] मन की गाँठें... मन की गाँठें... कौन खोले? एक साथ... एक साथ... सब क्यों मैं चाहूँ? [Verse 4 – warm and hopeful] चाहूँ... मेरा गीत गली-गली, हर होंठों पर... गाया जाए। चाहूँ... मेरे जाने के बाद भी, कोई प्यार से... याद करे। चाहूँ... जब मैं चला जाऊँ, दो बोल... कोई प्यार के कहे। जिसने... मुझको जाना भी नहीं, वो भी... मुस्काकर याद करे। [Final Chorus – gentle] मन की गाँठें... मन की गाँठें... कौन खोले? एक साथ... एक साथ... सब क्यों मैं चाहूँ? [Outro – almost spoken, instruments fading away] क्या मैं... सबको छलता हूँ, या... ख़ुद को ही... छलता हूँ? (Long pause) इंसान... ही तो हूँ... (Long pause) या... पाखंड को ही मैंने... इंसानियत... समझ लिया?

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