मत हँसना मुझ पर यारो,
मेरी भी एक भूल थी।
मेरी भी सुन लो यारो,
मैं भी मान गया था।
मैं भी मान गया था,
दिल से मान गया था।
अच्छे दिन की राहों पर,
हँसकर चल पड़ा था।
पंद्रह लाख के सपनों ने,
आँखों में घर कर लिया।
मैंने भी ताली बजाई थी,
मुझको भी विश्वास था।
मैं भी मान गया था,
हर वादा मान गया था।
ताली ही बजाता रहा,
मेरा सपना ले गया कौन?
फिर इक सुबह कुछ ऐसा बदला,
जेब में बस काग़ज़ थे।
कतारों में खड़े हुए हम,
चेहरे सब बेआवाज़ थे।
जुमला था, समझ न पाया,
शोर बहुत था चारों ओर।
सच की जो आवाज़ उठी तो,
तालियों में खो गई।
मैं भी मान गया था,
हर वादा मान गया था।
ताली ही बजाता रहा,
मेरा सपना ले गया कौन?
जब अंपायर ही साथ खड़ा हो,
खेल भला फिर कैसा हो?
सीटी भी जब हुक्म बजाए,
जीत का मतलब कैसा हो?
खुली वफ़ादारी चलती थी,
शर्म कहीं खोती गई।
कैमरों के आगे इक सलामी,
पूरी तस्वीर कहती गई।
मैं भी मान गया था,
हर वादा मान गया था।
ताली ही बजाता रहा,
मेरा सपना ले गया कौन?
जुमला था,
समझ न पाया।
फिर कुछ लोग उठ खड़े हुए,
डर से आँख मिलाने लगे।
जिनको सबसे ज़्यादा खोना था,
सच भी वही बताने लगे।
अब जो कोई वादा करता,
पहले सवाल मैं करता हूँ।
ताली अब भी बजती है,
पर सोच के मैं बजाता हूँ।
मैं भी मान गया था,
हर वादा मान गया था।
ताली ही बजाता रहा,
मेरा सपना ले गया कौन?
अब भी विश्वास रखता हूँ,
पर आँखें खुली रखता हूँ।
सपना अगर सबका होगा,
सबसे पहले ताली दूँगा।
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